Monday, December 28, 2009

पिता- भवानी प्रसाद मिश्र

आज पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
पिताजी भॊले बहादुर,
वज्र भुज नवनीत सा उर।
पिताजी जिनको बुढापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जॊ अभी भी दौड जाएं
जॊ अभी भी खिलखिलाएं।
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें।
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता।
आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
जबकि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे।
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस, लो वे न बरसें
पांचवें को वे न तरसें।
मैं मजे में हूं सही है,
घर नहीं हूं, बस यही है।
किन्तु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है।
किन्तु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना।
उन्हें कहना लिख रहा हूं
उन्हें कहना पढ रहा हूं।
कूदता हूं खेलता हूं,
दुःख डट कर ठेलता हूं।
और कहना मस्त हूं मैं,
यूं न कहना अस्त हूं मैं।
कह न देना मौन हूं मैं,
खुद न समझूं कौन हूं मैं,
देखना, कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना।
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस, लो वे न बरसें
पांचवें को वे न तरसें।
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको।
देह एक पहाड जैसे,
मन कि बड की झाड जैसे।
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए।
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नदी उमग ले।
एक टहनी कम न हो ले,
कम कहां, कि खम न हो ले,
ध्यान कितना, फिक्र कितनी,
डाल जितनी, जडें उतनी।
इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख्याल उनका।
हवा उनको धीर देना,
यह नही, जी चीर देना।
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस, लो वे न बरसें
पांचवें को वे न तरसें।

Friday, August 7, 2009

From my friend-

मीलों दूर है वह जिससे हर सांस का साझा है.आज की डाक पाती ले आयी है साजन की .भला हो इन बेला ,हर्सिंगार ,मालती का,विरहा की रात को भी अपनी मदमाती सुगंध से सजा सुहागन बना जाते हैं.........


शरद की पूनो में
झरता हर्सिगार
बादलों की गोद में सर डाल
मुस्काता चांद
मालती की गंध में डूबा
मह्महाता बाताश
तारों भरी चूनर में
लिपटा आकाश
सब जैसे तुम्हारे प्यार के पर्याय
ख्वाबों में मह्कता रहा
बेला सारी रात
और हम सोये रहे
तुम्हारे शब्दों के गले में
बाहें डाल.

आसमान के तारों की कल्पना करते समय हमारी आंखों के सामने हमेशा हर्सिंगार के फ़ूल आ जाते हैं.अगर अंजुरी भर हरसिंगार ऊपर को उछाले जायें तो तारों की बारिश होने का गुमां होने लगता है.

रात यूं खिलखिला के हंसी
आसमान के सीने पर
सैंकड़ों मोती बिखर गये
आंगन के हर्सिंगार को
हवा ने दुलराया
और
जमीं पर बिछे फ़ूल
सितारों का जवाब बन गये

- अनजान
From one of my friends-
बेले की पहले ये कलियां खिल जाने दो
कल का उत्तर पहले इनसे मिल जाने दो
तुम क्या जानो यह किन प्रश्नों की गांठ पड़ी
रजनीगंधा की ज्वार सुरभि को आने दो
इस नीम ओट से ऊपर उठने दो चंदा
घर के आंगन में तनिक रौशनी आने दो
......................................................
......................................................
खामोश धरा आकाश दिशायें सोई हैं
तुम क्या जानो क्या सोच रात भर रोई हैं
ये फ़ूल सेज के चरणों पर धर देने दो
मुझको आंचल में हर्सिंगार भर लेने दो
मिटने दो आंखों के आगे का अंधियारा
पथ पर पूरा पूरा प्रकाश हो लेने दो
यह ठंडी ठंडी रात उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी चले नहीं जाना बालम

- अनजान

Sunday, June 21, 2009

...

Wake

gently this morning

to a different day.

Listen

There is no bray

of buses,

no horns blow.

There is only

the silence

of a city

hushed

with snow...

Author unknown

Saturday, June 20, 2009

Introduction

They said, “Introduce yourself.”
It set me thinking, which facet of mine?
I am confused, not for identity crisis,
But for multiple identities.

Many roles I play, many facets I have-
A daughter, a sister, a friend, a beloved, a wife,
A learner, a follower, a leader, a teacher,
A motivator, a guide, a mentor.

As you behold, so you find.
Which face of mine shall I unwind?
I succeed at some fronts, fail at a few,
Then rise again to do the due.

For three and a half decades I have tread
In the lands and the hearts that many have dread.
Over the mounts, in the deserts, on the sand dunes
Where gigantic waves play life’s richest tunes.

Stealing some laughter, in struggle to survive,
Much more to learn, harder yet to strive.
Meeting expectation, fulfilling demand.
Yet, a bit for myself I do command.

Many lives I live in a solitary day,
You can identify me in the roles I play.
All roles integrated make me complete,
And thus, I live, a life bitter...sweet.

टूटा तारा

कल रात जो तारा टूटा था, वो मेरे आंगन गिरा था
तुमने भी तो दुआ मांगी थी...
वो तारा टूटा था, या कोई अपना था?
तुम्हारी ख्वाहिश पूरी करने मे तुम्हारे अपनो को कितनी बार टूटना पडेगा?