Friday, August 7, 2009

From my friend-

मीलों दूर है वह जिससे हर सांस का साझा है.आज की डाक पाती ले आयी है साजन की .भला हो इन बेला ,हर्सिंगार ,मालती का,विरहा की रात को भी अपनी मदमाती सुगंध से सजा सुहागन बना जाते हैं.........


शरद की पूनो में
झरता हर्सिगार
बादलों की गोद में सर डाल
मुस्काता चांद
मालती की गंध में डूबा
मह्महाता बाताश
तारों भरी चूनर में
लिपटा आकाश
सब जैसे तुम्हारे प्यार के पर्याय
ख्वाबों में मह्कता रहा
बेला सारी रात
और हम सोये रहे
तुम्हारे शब्दों के गले में
बाहें डाल.

आसमान के तारों की कल्पना करते समय हमारी आंखों के सामने हमेशा हर्सिंगार के फ़ूल आ जाते हैं.अगर अंजुरी भर हरसिंगार ऊपर को उछाले जायें तो तारों की बारिश होने का गुमां होने लगता है.

रात यूं खिलखिला के हंसी
आसमान के सीने पर
सैंकड़ों मोती बिखर गये
आंगन के हर्सिंगार को
हवा ने दुलराया
और
जमीं पर बिछे फ़ूल
सितारों का जवाब बन गये

- अनजान

2 comments:

Randhir Singh Suman said...

जमीं पर बिछे फ़ूल
सितारों का जवाब बन गये.nice

vijay kumar sappatti said...

ratna ji

nmamaskar

pahli baar aaya hoon aapke blog par , pata hi nahi tha ki itni sundar aur man bhaavak kavitaye yaha hai .. main to mugdh ho gay ji aapke blog ko padhkar , waaah

aapne sharad ritu ke baare me itni sajeevata se baayani ki hai ki main kya kahun ..

meri badhai sweekar karen..

regards

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com