Friday, August 7, 2009

From one of my friends-
बेले की पहले ये कलियां खिल जाने दो
कल का उत्तर पहले इनसे मिल जाने दो
तुम क्या जानो यह किन प्रश्नों की गांठ पड़ी
रजनीगंधा की ज्वार सुरभि को आने दो
इस नीम ओट से ऊपर उठने दो चंदा
घर के आंगन में तनिक रौशनी आने दो
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खामोश धरा आकाश दिशायें सोई हैं
तुम क्या जानो क्या सोच रात भर रोई हैं
ये फ़ूल सेज के चरणों पर धर देने दो
मुझको आंचल में हर्सिंगार भर लेने दो
मिटने दो आंखों के आगे का अंधियारा
पथ पर पूरा पूरा प्रकाश हो लेने दो
यह ठंडी ठंडी रात उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी चले नहीं जाना बालम

- अनजान

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