From my friend-
मीलों दूर है वह जिससे हर सांस का साझा है.आज की डाक पाती ले आयी है साजन की .भला हो इन बेला ,हर्सिंगार ,मालती का,विरहा की रात को भी अपनी मदमाती सुगंध से सजा सुहागन बना जाते हैं.........
शरद की पूनो में
झरता हर्सिगार
बादलों की गोद में सर डाल
मुस्काता चांद
मालती की गंध में डूबा
मह्महाता बाताश
तारों भरी चूनर में
लिपटा आकाश
सब जैसे तुम्हारे प्यार के पर्याय
ख्वाबों में मह्कता रहा
बेला सारी रात
और हम सोये रहे
तुम्हारे शब्दों के गले में
बाहें डाल.
आसमान के तारों की कल्पना करते समय हमारी आंखों के सामने हमेशा हर्सिंगार के फ़ूल आ जाते हैं.अगर अंजुरी भर हरसिंगार ऊपर को उछाले जायें तो तारों की बारिश होने का गुमां होने लगता है.
रात यूं खिलखिला के हंसी
आसमान के सीने पर
सैंकड़ों मोती बिखर गये
आंगन के हर्सिंगार को
हवा ने दुलराया
और
जमीं पर बिछे फ़ूल
सितारों का जवाब बन गये
- अनजान
I am Ratna. Teaching is my profession. But, I prefer calling myself a learner. When I look around, I find so many wonders yet unexplored, questions unanswered. I ponder at times, awe at times, feel surprised, happy at times and sad sometimes. I have lots of words circling around. I try to catch them. Some are caught, some fly away, yet some disappear. Let me see how many words I catch here. :)
Friday, August 7, 2009
From one of my friends-
बेले की पहले ये कलियां खिल जाने दो
कल का उत्तर पहले इनसे मिल जाने दो
तुम क्या जानो यह किन प्रश्नों की गांठ पड़ी
रजनीगंधा की ज्वार सुरभि को आने दो
इस नीम ओट से ऊपर उठने दो चंदा
घर के आंगन में तनिक रौशनी आने दो
......................................................
......................................................
खामोश धरा आकाश दिशायें सोई हैं
तुम क्या जानो क्या सोच रात भर रोई हैं
ये फ़ूल सेज के चरणों पर धर देने दो
मुझको आंचल में हर्सिंगार भर लेने दो
मिटने दो आंखों के आगे का अंधियारा
पथ पर पूरा पूरा प्रकाश हो लेने दो
यह ठंडी ठंडी रात उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी चले नहीं जाना बालम
- अनजान
बेले की पहले ये कलियां खिल जाने दो
कल का उत्तर पहले इनसे मिल जाने दो
तुम क्या जानो यह किन प्रश्नों की गांठ पड़ी
रजनीगंधा की ज्वार सुरभि को आने दो
इस नीम ओट से ऊपर उठने दो चंदा
घर के आंगन में तनिक रौशनी आने दो
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खामोश धरा आकाश दिशायें सोई हैं
तुम क्या जानो क्या सोच रात भर रोई हैं
ये फ़ूल सेज के चरणों पर धर देने दो
मुझको आंचल में हर्सिंगार भर लेने दो
मिटने दो आंखों के आगे का अंधियारा
पथ पर पूरा पूरा प्रकाश हो लेने दो
यह ठंडी ठंडी रात उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी चले नहीं जाना बालम
- अनजान
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