आज पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
पिताजी भॊले बहादुर,
वज्र भुज नवनीत सा उर।
पिताजी जिनको बुढापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जॊ अभी भी दौड जाएं
जॊ अभी भी खिलखिलाएं।
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें।
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता।
आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
जबकि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे।
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस, लो वे न बरसें
पांचवें को वे न तरसें।
मैं मजे में हूं सही है,
घर नहीं हूं, बस यही है।
किन्तु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है।
किन्तु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना।
उन्हें कहना लिख रहा हूं
उन्हें कहना पढ रहा हूं।
कूदता हूं खेलता हूं,
दुःख डट कर ठेलता हूं।
और कहना मस्त हूं मैं,
यूं न कहना अस्त हूं मैं।
कह न देना मौन हूं मैं,
खुद न समझूं कौन हूं मैं,
देखना, कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना।
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस, लो वे न बरसें
पांचवें को वे न तरसें।
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको।
देह एक पहाड जैसे,
मन कि बड की झाड जैसे।
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए।
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नदी उमग ले।
एक टहनी कम न हो ले,
कम कहां, कि खम न हो ले,
ध्यान कितना, फिक्र कितनी,
डाल जितनी, जडें उतनी।
इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख्याल उनका।
हवा उनको धीर देना,
यह नही, जी चीर देना।
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस, लो वे न बरसें
पांचवें को वे न तरसें।